छोटी छोटी लकड़ी चुनकर जब जल्दी जल्दी घर आती थीं
छोटे छोटे हाथों से लिखता था वो कुछ, मै खुश हो जाती थीं
जब मै रोटी बनाती वो पास आके दिखाता तकती अपनी
सूंदर सा सफ़ेद सा कुछ लिखा होता था , मैं पढ़ नहीं पाती
वो रात को हर रोज पूछता मुझसे की इन सितारों में पापा कौन से है
इतनी गरीबी थी गुजर बसर करने में पर वो दौलत था मेरी
आधा जंगल बीन लिया उसकी खुशियों के लिये
अब बड़ा हो गया और में बूढ़ी हो गई
अब वो पढ़ कर विदेश चला गया
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आँखे अब कम खुलती है, सुनता भी कम , दिखता भी कम है
सुबह उठकर रोज पक्की सड़क तक जाती हूँ ,, दूर तक देखने
लौटते लौटते शाम हो जाती है , कितने साल हो गए सिर्फ मै ही जानती हूँ .
अब समय बहुत थोड़ा बचा है और बेचैनी बहुत बढ़ गयी
दुआ हर पल यही दुआ तुम से मेरे ईश्वर
अब लौट आये , अब लौट आये।
माँ
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